STORYMIRROR

Krishna Bansal

Abstract

4  

Krishna Bansal

Abstract

नाली का कीड़ा

नाली का कीड़ा

1 min
686


मैंने नाली के कीड़े से कहा

कीचड़ में जो तुम 

कुलबुला रहे हो 

तड़प रहे हो 

इधर आओ

तुझे इस नर्क से बाहर निकाल दूं बाहर की दुनिया से 

तुम्हारा परिचय करवा दूं 

तुम्हारी दुनिया से अलग है 

यह दुनिया।


वह बोला 

क्या करूंगा बाहर आकर 

तुम्हारी दुनिया में। 


मेरा तो सारा अस्तित्व ही 

इसी नाली में है, 

बाहर आकर 

मेरा खाना पीना, रहना,

सोना कहां होगा 

कैसे होगा।

 

मैं एक भी दिन 

बाहर जी न पाऊंगा 

मेरा जो भी साथी बाहर गया 

कभी जिंदा वापस नहीं आया।


सबसे बड़ी बात 

हमें मनुष्यों की तरह 

विकसित होने का 

भ्रम भी नहीं पालना।


मैं स्तब्ध थी 

उसका तर्क सुन कर।  

कितना सही कह रहा था।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract