STORYMIRROR

Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

4  

Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

तुम क्या

तुम क्या

1 min
168

मेरे गम को साखी तुम क्या पहचानोगे

दरिया से लहरों को तुम क्या निकालोगे।


टूटकर भी हम फूलो से मुस्कुराकर रोये है

मेरे अक्स को तुम क्या शीशे से देखोगे।


हमारी तो ख़ुद की ख़ुद से ही नही बनी है

मेरे जख्मों पर तुम क्या मरहम लगाओगे।


पत्थर भी रो पड़े हैं, सुनकर दर्द हमारा,

मेरा दर्द, बेदर्द ज़मानेवाले तुम क्या जानोगे।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract