STORYMIRROR

Aditi Mishra

Abstract

3  

Aditi Mishra

Abstract

मुसाफ़िर

मुसाफ़िर

1 min
255

मैं मुसाफ़िर

चला फ़िर से

इस शहर से उस शहर


कभी भटकता किसी सड़क पर

फ़िर मंज़िल पा जाता

कभी कोई अनजान मोहल्ला

घर अपना बन जाता


लेकर मन में

सपने सारे

उम्मीदें और यादें

कुछ भोले से

कुछ क़रीब से


मन के मेरे सपने

कुछ अनजाने

कुछ अपने से

उन लोगों के चेहरे


भूले बिसरे

फ़िर से मिलने की फ़रियादें

बांँधकर अपने मन की डोरी

फ़िर से चला घरौंदा


मैं मुसाफ़िर

चला फ़िर से

इस शहर से उस शहर।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract