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Surendra kumar singh

Inspirational

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Surendra kumar singh

Inspirational

मुमकिन है

मुमकिन है

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एक सिलसिले के

हम नजर हैं

अमावस की रात ,दीयों की जगमग

धूम, धड़ाका से

आयातित झालरों की चकाचौन्ध

और कानफाड़ू पटाखों तक

मिठाइयों के स्वाद से

हार जीत की लगती हुयी बाजियों तक

परम्परा की तल्लीनता में

विजय के इतिहास के जश्न तक

महसूस होता रहा है,

जगमग दीवाली की रात बीती

सुबह आयी और अमावस में डूब गयी

ये मन का अंधेरा है

फिर भी मुमकिन इस दीवाली

कुछ ऐसा हो,

अमावस की रात जगमग हो

और सुबह हो

बिखरे हमारे अंदर का प्रकाश

जीवन के चारो ओर

और दिखने लगे सब कुछ

ठीक ठीक वैसा ही

जैसा कि है

और ये जो अमावस की घुलनशीलता है,

दिन में,आकर्षक रूप में

दिखने लगे अरे ये तो अंधेरा है

दिन में अपने मायावी रूप में

और मुमकिन है

राम जन्या

खुद ही आयें हमारे जीवन में

और बिखर जाएं पूरे परिवेश में

सुबह की तरह

खुद के होने के बोध के साथ।


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