STORYMIRROR

मृत्युशय्या

मृत्युशय्या

1 min
27.7K


एक अरसे से,

बिस्तर पे है मेरा तन,

पूरे जीवन का चलचित्र,

बुन रहा मेरा मन।


बचपन से पचपन का,

हर दृश्य संजो रहा है,

क्या खोया क्या नहीं पाया,

बस यही सोच रहा है।


दृश्य दर दृश्य,

चलचित्र आगे बढ़ रहा,

कभी होठों पे मुस्कान तो,

कभी माथे पे शिकन दे रहा।


शामिल है इसमें बचपन की मीठी,

और यौवन की तीखी शरारतें,

अरसा बीत गया फिर भी,

ज़ेहन में ताज़ा है वो यादें।


इन यादो के बीच एक,

याद और आती है,

काश अपने दिल की सुनता,

बात यही कह जाती है।


सोचता हूँ गर थोड़ी हिम्मत करता,

तो अपने सपने को जी लेता,

ज़िंदगी में सफलता न सही,

सुकून के ही कुछ रंग भर देता।


स्वभाविक है मन में,

ये कसक उठ रही है,

मुठ्ठियाँ मेरी अपने आप

कस रही है।


दिल की इन उलझनों को,

सुलझाने की अब शक्ति नहीं हैं,

शक्ति हो भी तो इसमें,

कोई अतिश्योक्ति नहीं है।


कि हर एक सपने की,

एक उम्र एक दौर होता है,

छूट जाये या टूट जाये तो,

बस कारणों पे ही गौर होता है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Drama