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Vikas Sharma Daksh

Abstract

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Vikas Sharma Daksh

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मोहे मत सुहागन किजौ

मोहे मत सुहागन किजौ

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बाबुल मोहे मत सुहागन किजौ,

चाहे अटरिया पर मोहे रख लिजौ,

मो को ना कतई दूर परदेस जाना,

घर आँगन द्वार मोहे बुहारन दिजौ,


चाव ना सुर्खी बिंदी चूड़ी का मोहे,

प्रीत की पीत चुनरिया तन पे सोहे,

रूखी सूखी खा के यहीं पड़ी रहूंगी,

करियो ना ये गठजोड़ कसम है तोहे,


बचपन इस आँगन द्वार दौड़ी भागी,

तुमरे आँचल में ही सदा सोयी जागी,

बालपन बड़े लाड प्यार ते थी पाली 

जोबन में अब क्यों बुरी लागन लागी,


कोहे तो है ये तुमरे कोरे कान भरयो,

जा साची बोल को मैं अपराध करयो,

हँसना छोड़ जो उखड़ो तुम मोहे देखे, 

बोझ ऐसा कौन है तुम दिल पे धरयो,


मोहे खातर करो थे थम माँ ते लराई,

को बात ना दी थी जान हवा में फुर्राई,

इब दिखन लग री मुझ में कौन बुराई,  

बाबुल काहे करो हो अब मोहे पराई,




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