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Vijay Kumar parashar "साखी"

Inspirational

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Inspirational

"मन मे गंदगी न हो विचारों की"

"मन मे गंदगी न हो विचारों की"

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होली फूलों की हो या फिर होली हो रंगों की

याद रखे बस मन मे गंदगी न हो विचारों की

हमारा हृदय हो शीतल,भीतर न हो कोई मल

होली खेलेंगे हम शांत,शीतलता के रंगों की


आओ मिलजुलकर हम सब लोग खेले,रंग,

दुश्मनी की मिटा दे,हर ओर से आज तरंग,

होली खेलेंगे हम बस नई उमंग,आशाओं की

प्रातः करेंगे मां शीतला पूजा,फिर काम दूजा


मां ने स्वीकारी थी,ठंडी राबड़ी कुम्हारों की

मां न करती,भेदभाव,सबसे रखती समभाव

करती हत्या,मां तो बस जातिगत विचारों की

शीतलाष्टमी होगी मां मेहर,जीवन सप्तरंगों की


ओल्या के साथ पापड़,पापड़ी का रसास्वादन

आज शीतल भोजन से मन हो जाता है, प्रसन्न

शीतलाष्टमी पर हो जाती सबकी,सही ऋतुचर्या

गर्मी बढ़ने के साथ ही सुधर जाती है, दिनचर्या


गर्मी आई,देखो फिर करामात ठंडे भोजनों की

मिट जाती आधी-व्याधि,ठंडे भोजन को खाने से

भुजंग भी हो जाते है,आज शीतल,ठंडे भोजन से

आज होती ,भरमार,ठंडे भोज के आयोजनों की


मन मलिनता मिट जाती है,बहुत बरसों की

होली फूलों की हो या फिर होली हो रंगों की

याद रखे बस मन मे गंदगी न हो विचारों की

अपनी परंपरा ओर संस्कृति आप याद रखो,


उत्सव,पर्वो से एकता बढ़ती है,परिवारों की

होली खेलों दोस्तो आप लोग,बस मलंगों की

पर पीड़ा को आप लोग सदैव ही याद रखो,

होली खेलें शांति से न खेलों होली दंगो की


होली खेलो पेड़ो से,होली खेलो पलास फूलों से

पेड़ो बिना जिंदगी अधूरी,हम सब किसानों की

हमारी तो प्यारी होली है,बस,पेड़,वृक्ष,गुलाबों की

याद रखे बस मन में गंदगी न हो विचारों की.



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