मन बहुत उदास है।
मन बहुत उदास है।
मन बहुत उदास है, और सोचता है अक्सर,
कि उदास ना रहूं इस तरह,
पर उदासी परिस्थितियों की गुलाम है,
सामने आ ही जाती है मुंह उठाए,
उदासी के बिना रहना संभव भी नहीं,
मन समय के सफेद घोड़े में,
सवार सरपट दौड़ रहा है,
सुबह से शाम तक,
जिम्मेदारियों का बोझ उठाए,
जब आप स्वयं को असमर्थ पाते हो,
तो उदासी का होना भी लाजमी है।
मन खुले आसमान तले,
बादलों के उस पार,
इन्द्र धनुष के रंगों में रंगे
खुद को पाना चाहता है,
भिगोना चाहता है अपने सर्वश को,
बूंद बूंद जल वर्षा से,
ओढ़ना चाहता है खुद को,
घने कोहरे की चादर में,
और कहना चाहता है,
अपनी व्यथा को,
जो पहाड़ों से टकराकर,
बिखर जाए सम्पूर्ण सृष्टि में,
और मासूम दिल चुपचाप देखता रहे,
इस विकिरण को।
आखिर इस उदासी का अंत होगा या नहीं,
या यूं ही मन उदास रहने लगेगा,
अपने ही आसपास,
खिलखिलाते शब्दों के साथ।
