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Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

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Chandresh Kumar Chhatlani

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मजबूर आदत

मजबूर आदत

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एक आदमी सुबह-सुबह
मंदिर की घंटी बजाता है,
कोई ग्रन्थ पढ़ते हुए
अपनी आत्मा से पूछता है —
“क्या आज सत्य का साथ मिलेगा?”
लेकिन ऑफ़िस पहुँचते ही
वो क्लाइंट से कहता है —
“सर, ये डील बिल्कुल फेयर है।”
जबकि उसे पता होता है, नहीं है।

दूसरा आदमी
मस्जिद की शांति में सजदा करता है,
अल्लाह से रोज़ की सादगी माँगता है,
लेकिन शाम को ग्राहक को बहकाकर
ज़रा ज़्यादा मुनाफ़ा कमा लेता है।
उसकी भी नीयत बुरी नहीं है,
बस बच्चों की फीस बढ़ गई है।

एक तीसरा आदमी
गुरुद्वारे में झाड़ू लगाता है,
"सेवा" में उसे सुकून मिलता है।
वो सबके जूते ठीक से जमाता है,
पर दफ़्तर में
अपने जूनियर का श्रेय
बॉस के सामने खुद ले लेता है।
क्योंकि प्रमोशन का मौसम है।

चौथा आदमी
चर्च की बेंच पर बैठकर प्रार्थना करता है —
"Lord, give me strength to be honest."
पर वो भी
अपने रिज़्यूमे में थोड़ा अनुभव दूसरों का जोड़ देता है
जो कभी उसने लिया ही नहीं था।
वो जानता है,
एक छोटी सी कमी का सच,
उसे नौकरी से दूर कर सकता है।

किसी गाँव की औरत
बौद्ध स्तूप के पास
शांति के मंत्र दोहराती है,
लेकिन शहर आकर
अपने हुनर की क़ीमत पाने के लिए
कभी-कभी बोल देती है कुछ ऐसा
जिसके वो योग्य नहीं।
क्योंकि सच्ची/झूठी पहचान भी अब बिकती है।

ये सब अलग-अलग हैं—
धर्म, पहनावा, भाषा, पूजा का ढंग,
पर एक जैसे हैं
उनके भीतर के द्वंद्व।

धर्म में लिखे सच्चाई, मूल्य और सिद्धांत
जल जाते हैं,
पेट की तेज़ जलती आग से।
ज़िंदगी के कुछ प्रश्न
मज़हबी किताबों से हल नहीं होते।

रात को जब बत्तियाँ बुझती हैं,
और उनमें से कोई आदमी,
आईने से आँखें मिलाता है,
तब शायद खुद से पूछता भी हो—
"क्या आज मैंने किसी सच को बचा कर रखा?"
अगर जवाब हाँ होता है,
तो उसे लगता होगा—
उसकी आध्यात्मिकता अभी जीवित है,

लगता होगा,
झूठ बोलना उसकी आदत नहीं,
बस मज़बूरी है।


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