STORYMIRROR

Dheerja Sharma

Abstract

2  

Dheerja Sharma

Abstract

मिट्टी हूँ

मिट्टी हूँ

1 min
40

मिट्टी हूँ मैं

कहाँ जाऊंगी?

इधर से बह कर

उधर पहुंच जाऊंगी।

ऊपर से उड़ कर

नीचे आ जाऊंगी।


बैठ जाऊंगी नयी जगह

नये पेड़ पत्तों पर।

नये नये रूप में

मैं ढल जाऊंगी।

हर बदलते मौसम की

मार झेल जाऊंगी।

मिट्टी हूँ मैं

कहाँ जाऊंगी?



ಈ ವಿಷಯವನ್ನು ರೇಟ್ ಮಾಡಿ
ಲಾಗ್ ಇನ್ ಮಾಡಿ

Similar hindi poem from Abstract