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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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मिलते जुलते रहिए

मिलते जुलते रहिए

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मिलते जुलते रहिए      
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 कब कौन दुनिया छोड़ जाए, कुछ पता नहीं होता। फिर भी हम इतने गुमान में रहते हैं। कि जाने क्या-क्या सोचते रहते हैं अपने और अपनों से मिलना जुलना, बातचीत करना  और हंसी ठहाके, सुख-दुख बाँटना तक भूल जाते हैं, और दोष समयाभाव को देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। कैसे भी हो अपने और अपनों से  मिलते जुलते, बातचीत करते रहिए  चाहे जितना व्यस्त हों, इतना जरूर करते रहिए। क्या पता कल मिलने या बातचीत के  अरमान सदा-सदा के लिए अधूरे रह जायें  और हम या आप सिर्फ अफसोस करते रह जायें। मगर जाने वाला तो जा चुका होगा  हमारा आपका इंतजार जब उसने नहीं किया  अपने जाने का संदेश तक नहीं भेज पाया, फिर अफसोस कर या आँसू बहाकर भी  भला हम-आप कौन सा प्रतिफल पायेंगे? या आगे व्यस्तता का बहाना नहीं बनायेंगे? फैसला हमें ही नहीं आपको भी करना है  कि मिलते जुलते लोगों के दिलो-दिमाग में रहना है, या सिर्फ गुमान में एकाकी बनकर जीवन बिताना है  और अपने या अपनों से दूर-दूर रहकर व्यस्तता का बहाना बनाना है, जीवन जीना नहीं सिर्फ ढोते जाना है।
 सुधीर श्रीवास्तव 


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