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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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मुक्तक

मुक्तक

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(दोहा/ रोला /चौपाई /सरसी/ मुक्त छंद)  ******** रोला मुक्तक ******* माना हम मजदूर, दोष इसमें क्या मेरा। यह तो मेरा भाग्य, मिला दुर्भाग्य घनेरा।। कहें मित्र यमराज, हुआ क्या जो मैं पापी- हमने भी नौ माह, कोख माँ किया बसेरा।। मजदूरों के नाम, खूब होता है खेला। लगती ऐसी भीड़, दीखता जैसे मेला। कहें मित्र यमराज, नहीं इनको अब छेड़ो- वरना मुँह का स्वाद, लगे जस आप करेला।।     संगत करिये आप, नहीं हो जो दुखदाई।       और उसे भी आज, लगे ना तनिक पराई।           कहें मित्र यमराज, यार मुश्किल मत मानो-  हमें बताओ मित्र, ठीक है क्या अँगड़ाई।। अपने मन की मैं व्यथा, नहीं कहूँगा यार। व्यर्थ बताऊँ क्यों भला, ठना हृदय जो रार।। कहते हैं यमराज जी, सब लो अच्छा मान- कैसे कह दूँ आपको, हो मेरे सरकार।। जीवन में अवरोध का, होता बड़ा प्रभाव। इससे करना मत कभी, मित्रों आप दुराव। प्रेम प्यार भी दीजिए, चाह रहा अवरोध - अड़ जाता ये राह में, रखे दूर हर घाव।। नहीं मानते बात, बड़े होते अब बच्चे। कहाँ समझते राज, अभी हैं वो सब कच्चे। कहें मित्र यमराज, घोर कलयुग है आया- सारा व्यर्थ प्रयास, कहें क्यों बनना सच्चे।। अपने अवगुण देख, सभी सचेत हो जाएँ। तभी बनेगी बात, स्वयं को मत भरमाएँ।। कहें मित्र यमराज, दंभ कल पड़े न भारी- चिंता करिए आप, नहीं ठुकराए जाएँ।। मेहनती मज़दूर, अथक परिश्रम करता। उसका ही परिवार, भूख की आहें भरता।। जीवन का अधिकार, चाह वो भी तो रखते- कहें मित्र यमराज, मिलेगी कब तक समता।। ******* दोहा मुक्तक  ******* जीवन में अवरोध का, होता बड़ा प्रभाव। इससे करना मत कभी, मित्रों आप दुराव। प्रेम प्यार भी दीजिए, चाह रहा अवरोध - अड़ जाता ये राह में, रखे दूर हर घाव।। अंधे की लाठी रहा, आज समझता भार। धन दौलत लालच भरे, टपकाता बस लार। कहें मित्र यमराज, दृश्य रहा दिख रोज- अब बूढ़े माँ- बाप ने, समझा जीवन सार।। करता कोई घात यदि, आप करो प्रतिघात। मान लीजिए मित्रवर, तभी बनेगी बात।। समय नहीं है आज का, बैठो रखकर हाथ- आज दौर ऐसा हुआ, पहले मुक्का लात।। पैरों में बिखरे पड़े, सपने जो थे यार। खाते हम सब मार हैं, बनकर के लाचार। समझ नहीं हम पा रहे, क्या ये है संयोग- या किस्मत के संग में, ठनी हुई है रार।। राष्ट्रगान होता जहांँ, छा जाते टैगोर। इतने वर्षों बाद भी, बने हुए सिरमौर। नाम रवींदर नाथ था, कहता है यह देश- भारतवासी मानते, मिलता ऊर्जा सौर।। सर्वोपरि है राष्ट्र हित, यह हम सबको ध्यान। पर ऐसे कुछ लोग भी, बने हुए अज्ञान।। होती है पीड़ा बड़ी, जब हो धर्म विवाद- बड़ा देश से कब भला, होती निज पहचान।। कविता तो सब लिख रहे, करते नहीं विचार। कुछ भी लिखते नित्य हैं, बिना किसी आधार।। बस घमंड में चूर हैं, बनकर घूमें श्रेष्ठ - लोग खूब चर्चा करें, नहीं लेश संस्कार।। ***** चौपाई मुक्तक  ******* इमली नमक मिर्च की चटनी। बनती है जब करते घुटनी। खाते जब चटकारे लेकर - स्वाद हृदय को पटनी-पटनी।। कभी किसी की बातें मानो। अपने को भी थोड़ा जानो। इतनी अक्ल नहीं क्यों आती- घर बैठो अरु गोबर सानो।। नहीं दिया जब हमने धोखा। फिर क्यों खाना पड़ता चोखा।। लगता अब कुछ करना होगा - या फिर बनना होगा सोखा।। धरा मात सम एक समाना। इससे ही है देख जमाना।। नहीं समझ जब हम हैं पाते- हो जाते हैं तब बेगाना।। ******* सरसी छंद मुक्तक ******* कौन किसी का मीत यहाँ पर, सबको स्वारथ रोग। इसीलिए तो करते हैं सब, नाहक दुख का भोग। चलना होगा आप सँभल कर, कहते हैं यमराज- सुख-दुख में सहभागी बनकर, रहिए सभी निरोग।। ******* विविध मुक्तक                        ****** कौन अपना है हमारा आज इस संसार में। स्वार्थ में डूबे हुए सब व्यर्थ के अनुमान में। जानते हैं हम सभी रोकर भला होगा नहीं- आज जो समझा नहीं वह जाएगा कल काल में।। आपने इतना रुलाया क्या मिला। साथ ही ये भी बताओ क्या गिला। हमने कब चाहा भला क्या आप से- जो दिया है आपने ऐसा सिला।। अपने अवगुण देखकर करिए आप सुधार। यह तो ऐसा है नहीं फेंको आप उतार। शुभचिंतक कोई नहीं बिसरायेगा रोज- सबसे ज्यादा फिक्र तो करता बस परिवार।। भौंकते कुत्ते बहुत हैं आजकल।        पर नहीं उनकी रही अब दाल गल।  खुद को न जाने समझ बैठे हैं क्या-  और गिरते जा रहे हैं मुंँह के बल।। भक्ति भावना सफल वही है। जिसमें नहिं कोई छल-बल है।। ध्यान ईश का करते रहना - यही बड़ा जीवन संबल है।। मारिए पत्थर जमाना चाहता है। आपको भी आजमाना चाहता है। व्यर्थ की तकरार तो अब छोड़िए - खून के आँसू रुलाना चाहता है।। जो थे अपने सब पराए हो गए। कह रहे हम आपके थे कब हुए। सपनों से बाहर निकलना सीख लो- मुफ्त में उपहार कब मिलते नए। सुधीर श्रीवास्तव  


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