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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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कुण्डलिनी छंद

कुण्डलिनी छंद

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हर्षित  मन मेरा सभी, करें नमन स्वीकार। बस आशीषों के सिवा, और नहीं दरकार।। और नहीं दरकार, मिले वो जिससे वंचित। जीवन का बस सार, रहे मन मेरा संचित।।१ ईश्वर ने जीवन दिया, मानें हम आभार। बनी रहे उनकी कृपा, मधुरिम जीवन सार।। मधुरिम जीवन सार, नजर रखता है हम पर। वही चलाता एक है, ईश ही जगती का घर।।२ चारों खाने चित्त हैं, फिर भी इतना दंभ। संग पतन का हो रहा, अभी आज आरंभ।। अभी आज आरंभ, भले ना मेरी माने। आयेगा वो दिवस, गिरेंगे चारों खाने।।३ बाँटो इतना प्यार तुम, दुनिया देखे रंग। बिना किसी भी स्वार्थ के, कर दो सबको दंग।। कर दो सबको दंग, नहीं किसी को छाँटो। कभी रुके ना हाथ, आप बस इतना बाँटो।।४ अपने भी करते नहीं, अपनों पर विश्वास। सबको लगता है यही, घातक होगी आस।। घातक होगी आस, सोच ये कैसे सपने। जैसे हम सब लोग, हमें मिलते हैं अपने।।५ उसने हमको जो दिया, लेने को मजबूर। मुश्किल थी इतनी बड़ी, कैसे करता दूर।। कैसे करता दूर, भार जो सौंपा सबने। वो ही जिम्मेदार, लिया जो खुद से उसने।।६ होता खुशियों का नहीं, कोई ओर या छोर। कहें मित्र यमराज जी, थामे रहना डोर।। थामे रहना डोर, सुखद जीवन वो बोता। नहीं छोड़ना आप, बहुत दुखदाई होता।।७ ममता की माँ का कभी, नहीं लगाना मोल। वरना कहेंगे लोग सब, तुम हो क्या बकलोल।। तुम हो क्या बकलोल, समझते क्या हो समता। माँ होती अनमोल, जगत तारी है ममता।।८ मुश्किल है यह बोलना, किसकी होगी जीत। पर निश्चित ये मानिए, विजयी होगी प्रीत।। विजयी होगी प्रीत, थाम कर तुम बैठो दिल। आये जो परिणाम, नहीं अब कोई मुश्किल।।९ रखना दृष्टा भाव निज, अपने मन में आप। ईश्वर की तब हो कृपा, कभी न होगा पाप।। कभी न होगा पाप, भाव उत्तम ही चखना। निंदा नफ़रत दूर, प्रेम से सबको रखना।।१० हल्ला व्यर्थ मचा रहे, करते रहिए दान। ईश समायाक्ष हृदय में, दृष्टा का निज भान।। दृष्टा का निज भान, ईश के सब हैं लल्ला। सबका निज सौभाग्य, करो मत नाहक हल्ला।।११ करते रहिए दान सब, बिना मचाए शोर। ईश रखो निज हृदय में, नई सुबह का भोर।। नई सुबह की भोर, भाव सुखदा मन भरते। रखना सबसे प्रीति, काम सब ईश्वर करते।।१२ सत्ता के इस खेल का, अजब-गजब है रंग। क्या कुछ अब है हो रहा,जनमानस भी दंग।। जनमानस भी दंग, चाहते वो भी भत्ता। कहें मित्र यमराज, गर्त में जाती सत्ता।।१३ करते गणपति वंदना, भक्त जोड़कर हाथ। रहिए प्रभु जी आप तो, सदा हमारे साथ।। सदा हमारे साथ, कष्ट मम रहना हरते। प्रथम पूज्य हो आप, काज पूरण सब करते।।१४ शाला आकर हम सभी, सीख रहे हैं छंद। गुरुजन करते दूर हैं, मन के सारे द्वंद्व।। मन के सारे द्वंद्व, गूँथते जैसे माला। मिलता नव आधार, छंद आभासी शाला।।१५ जिसका कोई है नहीं, इस जगती में तोल। फिर खुजली क्यों हो रही, लगा रहे जो मोल।। लगा रहे जो मोल, ज्ञान तू पाया किसका। इतना तुझे न ज्ञान, धरा सम कद है जिसका।।१६ रखते चाहत ही सदा, रहे प्रेम व्यवहार। नहीं किसी के आ बसे, कुत्सित भाव विचार।। कुत्सित भाव विचार, स्वाद मीठा सब चखते। मेल-जोल हो संग, सभी इस जीवन रखते।।१७ सबकी चाहत ही सदा, रहे प्रेम व्यवहार। नहीं किसी के मन बसे, कुत्सित भाव विचार। कुत्सित भाव विचार, नहीं हो जन के उर की।। सुखी रहे संसार, सोच इस जीवन सबकी।।१८ बदल गया है अब बहुत, आज खेल का रंग। प्रतिस्पर्धा है खेल में, मन में भारी जंग।। मन में भारी जंग, भावना खेत गया है। चाहो जो हो खेल, दृश्य सब बदल गया है।।१९ चलते रहना है हमें, बिना किए विश्राम। तब ही तो मंजिल मिले, और संग आराम।। और संग आराम, सोच अच्छे ही फलते। कहें मित्र यमराज, साथ सब रहते चलते।।२० हारी बाजी जीतना, यही हमारी सोच। नहीं और कुछ मन भरा, या है कोई लोच।। या है कोई लोच, व्यर्थ मत बनिए काजी। तब ही होगी हाथ, हमारे हारी बाजी।।२१ कुंठा अपनी छोड़ कर, करो जीत की बात। हार शब्द को भूल जा, बीत गई वो रात।। बीत गई वो रात, छोड़ना मन की मुंठा। रखो जीत का लक्ष्य, भूलकर सारी कुंठा।।२२ समझ रहे हो क्यों भला, लगता इतना भार। या मन में कुछ और है, दूजा कोई सार।। दूजा कोई सार, आप जो छिपा रहे हो। कहें मित्र यमराज, बता जो समझ रहे हो।।२३ लादे इतना भार क्यों, नाहक में तुम यार। या फिर बैठे ठान कर, मन में कोई रार।। मन में कोई रार, बोझ या भारी वादे। बिना हिचक दो बोल , भार क्यों इतना लादे।।२४ जैसा चाहा लग गया, संकट का अनुमान। अब तो होना चाहिए, इसका पूर्ण निदान।। इसका पूर्ण निदान, चाहते हैं सब वैसा। अपराधों से मुक्त, शाँति की धारा जैसा।।२५ आया हिंसा का नया, ये है कैसा दौर। जैसे गिरते पेड़ से, मरे आम के बौर।। मरे आम के बौर, कौन है इसको लाया। ऐसी ना थी उम्मीद, उलटबासी ले आया।।२६ शादी भी है साधना, नहीं समझना खेल। नहीं समझ आया जिसे, उसका निकला तेल।। उसका निकला तेल, रही होती बर्बादी। ये तो सृष्टि सार, जरूरी होती शादी।। २७ शादी रिश्तों के लिए, सर्वश्रेष्ठ आधार। वरना जायेगा बिखर, संबंधों का सार।। संबंधों का सार, जिसके हम सभी आदी। इसीलिए अनिवार्य, सृजन संतुलित शादी।।२८ रिश्ता है अनिवार्यता, शादी का संबंध। बस इतना ही चाहिए, आए प्रेम सुगंध।। आए प्रेम सुगंध, नहीं होता है सस्ता। अंतर्मन से देखिए, तभी समझोगे रिश्ता।।२९ करते हैं जो परवरिश, मिले न उनको मान। हम सब शायद हो गए, आज बहुत नादान।। आज बहुत नादान, यही सब हमको मिलते। जैसा हम सब आज, दंभ में जमकर करते।।३० सुधीर श्रीवास्तव


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