दोहा
दोहा
दोहा - कहें सुधीर कविराय ======== मातु शारदा ======== मातु शारदे आपकी, मुझ पर कृपा अपार। शीश झुका तव चरण में, देना मुझको तार।। सत्य सनातन धर्म की, चहुँदिश जय-जयकार। मातु शारदे शक्ति का, सबने देखा सार।। एक बार फिर से शुरू, देखो पूजा पाठ। कल तक था जो लग रहा, सबसे भारी काठ।। मैया मेरी शारदे, करती कृपा अपार। आया जो परिणाम है, एक मात्र आधार।। ********** संकट मोचन दुख हरो.... *********** संकट मोचन दुख हरो, करते भक्त पुकार। जन मन को सारे कष्ट से, आप करो उद्धार।।१ सेवक प्रभु श्री राम के, पवन पुत्र हनुमान। संकट मोचन दुख हरो, और संग दो ज्ञान।।२ बजरंगी से है बड़ा, कौन राम का भक्त।। संकट मोचन दुख हरो, जो जन तुममें आसक्त।।३ संकट मोचन दुख हरो, करके बड़ा प्रहार। आतंकी जो धरा पर, अब करिए संहार।।४ चाह मित्र यमराज भी, प्रभु आप से आज। संकट मोचन दुख हरो, बनें सभी के काज।।५ ****** विविध ****** भला चाहता कौन है, अब अपनों का प्यार। वो ही तो लगते हमें, धूर्त और मक्कार।। बेटा जो घर का बड़ा, पाता कितना मान। जिसका होता है उसे, बहुत देर में ज्ञान।। यह कैसा दस्तूर है, कैसा इसका रंग। मर्यादाएं हो रहीं, सरेआम ही भंग।। सच का पथ ही श्रेष्ठ है, इसे बना लें राह। मुश्किल होगी सैकड़ों, शुभता बने गवाह।। सच का पथ ही श्रेष्ठ है, चित्त उतारो आप। आते हैं अवरोध बहु, अंतिम सुखदा जाप।। सच का पथ ही श्रेष्ठ है, मानो मेरी बात। इसके आगे झूठ की, व्यर्थ सभी औकात।। सच का पथ ही श्रेष्ठ है, देती खुशी अपार। चलता इसकी राह जो, मान मिले संसार।। समझौता कैसे करे, घर में है परिवार। बिन मेहनत उसका भला, क्या जीवन संसार।। श्रम में इतना लीन वो, और नहीं कुछ ध्यान। केवल उसको है पता, भूख पेट का ज्ञान।। मेरी इतनी बात यदि, रहा आपको याद। बिना उचित संसर्ग के, नाहक है फरियाद।। ज्ञान-दान का है बड़ा, ऊँचा उत्तम स्थान। जो होते गुणवान हैं, बनते बड़े महान।। नमन करूँ प्रभु राम को, जोड़े दोनों हाथ। इतनी सी करिए कृपा, देते रहना साथ।। सबको ही देते रहें, सदा उचित सम्मान। इसके पीछे का बड़ा, सरल सहज विज्ञान।। मम प्रिय वर यमराज जी, देते शिक्षा ज्ञान। इसीलिए तो बढ़ रहा, अब मेरा भी मान।। सीमा पर सैनिक खड़ा, लिए हथेली जान। धरती माँ के लाल को, इसका है अभिमान।। रेखाएं जो दिख रहीं, आप हथेली चार। इसके आगे भी बहुत, आगे है संसार।। कवि के मन की वेदना, भला समझता कौन। शब्दों से है बोलता, वाणी से वो मौन।। कवि के मन की वेदना, कहते कविता छंद। मातु शारदे की कृपा, देती परमानंद।। कहता आज समाज से, इतना बदले आप। कवि के मन की वेदना, बढ़ता जाता पाप।। राजनीति के क्षेत्र में, नैतिकता लाचार। सबसे ज्यादा हो रहा, यहीं आपसी मार।। सबसे ज्यादा इन दिनों, नैतिकता लाचार। जितना लेते ओट हैं, उतना ही व्यभिचार।। बेईमानों के सामने, नैतिकता लाचार। बेचारी बेबस हुई, भूल रहे सब प्यार।। देते हैं यमराज जी, शुभाशीष अरु प्यार। जन्म दिवस पर दें दुआ, जीना वर्ष हजार।। रोटी कपड़ा और घर, मानव का है पक्ष। इधर उधर की छोड़िए, जन चाहे प्रत्यक्ष।। समय-समय की बात है, जान रहे हम आप। कोस-कोसकर वक्त को, करते व्यर्थ अलाप।। फैला इतना धुंध है, चलें सुरक्षित आप। यह जीवन जो आपका, बने नहीं अभिशाप।। छँट जाएगा धुंध ये, मत हो आप अधीर। औरों को भी देखिए, हँसकर सहते पीर।। बीती ताहि बिसार कर, आगे बढ़िए आप। कल में जो कुछ भी हुआ, मान उसे संताप।। इतनी चिंता व्यर्थ है, कहते हैं यमराज। कल किसने देखा यहाँ, सब कुछ तो है आज।। अपना कोई है नहीं, यही आज का ज्ञान। अपने केवल आप हैं, कहते मित्र सुजान।। प्रकृति बदलती है नहीं, जान रहे हम लोग। करते नित अवमानना, अरु कहते संयोग।। दोहन होता प्रकृति का, चहुँदिश में हर ओर। इसीलिए तो दिख रहा, कहर रोज घनघोर।। मान चाहती है प्रकृति, नहीं हमारा ध्यान। यह कैसी संवेदना, जिसका नहीं विधान।। आज सभी जन चाहते, हो स्वागत सत्कार। पर सोचें नहिं एक पल, क्या इसका आधार।। प्रेम भाव से जब करें, हम स्वागत सत्कार। तभी हृदय का भाव से, धन्यवाद आभार।। आज महावर का नहीं, रहा पुराना भाव। भागम-भाग में नारियाँ, इससे करें दुराव।। अपवादों को छोड़कर, इसका रंग उदास। पहल महावर की कहाँ, आज रही बिंदास।। मात-पिता के चरण में , सारा सकल जहान। उनकी छाया में हमें, सदा सुरक्षित भान।। ईश्वर की होती कृपा, मात पिता जो साथ। धन-दौलत से भी बड़ा, रहे शीश पर हाथ।। व्यर्थ सभी हैं गा रहे, नाहक अपना राग। अपने अपने दंभ में, रहते केवल भाग।। होता नहीं विराग से, जीवन का उद्धार। चलता निज कर्तव्य पथ, करिए ईश पुकार।। चाय एक कप जो मिला, आया दिल को चैन। उत्कंठा थी इस हृदय, भीगे उसके नैन।। गर्मी से बेचैन थी, सोचा पी लूँ चाय। माँ ने पकड़ाया मुझे, मंद-मंद मुस्काय।। मानव के मन में छिपा, जितना ज्यादा पाप। उतना ही वो कर रहा, कंठी माला जाप।। मानव के मन में छिपा, अच्छा बुरा विचार। उलझा रहता है सदा, बिना तर्क तकरार।। चिंता है किस बात की, करिए प्रभु का ध्यान। सब कुछ उनकी ही कृपा, रचते उचित विधान।। खटका रहता है बना, मात-पिता को नित्य। बाहर बिटिया जब रहे, समझे जग औचित्य॥ खतरा अपनों से बढ़ा, कैसे करें उपाय। दुविधा में जन-मन फँसा, कोई नहीं सहाय॥ बादल अब संदेह के, कैसे होंगे दूर। मानव अब रहता डरा, क्योंकि है मजबूर।। दुविधा से बाहर निकल, मस्ती कर ले यार। क्यों करता है आप ही, निज जीवन बेकार।। कैंची जैसी चल रही, तेरी बहुत जुब़ान। उस पर अब ताला लगा, यही आज का ज्ञान।। ताला कैंची दे रहे, मिलकर ऐसी सीख। अंकुश खुद पर राखिए, नहीं व्यर्थ में चीख।। शस्त्र हाथ में है मगर, करिए नहीं प्रहार। पता नहीं जो सामने, शत्रु मान मत मार।। निकलो बाहर द्वंद्व से, खोजो कोई राह। गीत ग़ज़ल कविता पढ़ो, मन रख उत्तम चाह।। फँसा द्वंद्व में जो रहा, पाता कब आनंद। मस्ती में आगे बढ़ो, व्यर्थ सभी छल-छंद।। अब अतीत के दौर से, बाहर निकलो आप। वर्तमान भी देखिए, करते जमकर पाप।। समय चक्र के खेल का, होता किसको ज्ञान। सरल नहीं है समझना, ईश्वर रचा विधान।। जैसे-जैसे बढ़ रहा, गर्मी का आतंक। अग्नि कांड भी होड़ में, जैसे बना कलंक।। मानव मन में आजकल, जलती ईर्ष्या आग। अपवादों को छोड़कर, भूल रहे सब त्याग।। मुर्दे जिसमें जल रहे, वो भी तो इक आग। जब तक हम श्मशान में, तब तक ही वैराग।। दोष भला क्या आग का, करती अपना काम। नादानी हम सब करें, और उसे बदनाम।। ======== सुधीर श्रीवास्तव
