STORYMIRROR

शशि कांत श्रीवास्तव

Abstract

3  

शशि कांत श्रीवास्तव

Abstract

महकती सुबह

महकती सुबह

1 min
385

 वो महकती सुबह कल भी थी 

 और आज भी है 

 फर्क बस इतना सा है कि

 कल की सुबह में एक तराना था, 


 तो फिजाओं में तैरती थी 

 फूलों की खुश्बु और 

 ईश-वंदन की मधुर वाणी,


आज भी होती है वही सुबह 

महकती है क्या ...?

फूलों की जगह, बारूद की गंध 

ईश-वंदन की जगह,

गोलियों की आवाज, 


और बेगुनाहों और मासूमों की चीत्कार  

सुनाई देती है कानों को

आओ, चलें, करें हम वंदना ईश्वर से कि,

फिर से हो जाये वो सुबह 

जो हरदम महकती रहे ईश वंदन से।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract