STORYMIRROR

Rajendra Singh

Abstract

3  

Rajendra Singh

Abstract

मुफ्लिसी

मुफ्लिसी

1 min
192

मुफ्लिसी तेरा नाम कुछ और है। 

और तुम्हे कहते कुछ और हैं।। 

आज तक आपका पता ही नहीं चला, 

कि आपका कितना, कहाँ कितना छौर है।। 

मुफ्लिसी में डूब गया तार। 


मगर घट में है उजियारा ।। 

मगर पता ही नहीं चला कब हुई शाम 

तो कब हुई भौर है।। 

राजेंद्र यह मतलबियों का दौर है।। 



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract