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Bhavna Thaker

Abstract

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Bhavna Thaker

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मेरी सदा

मेरी सदा

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मैं अपने लबों को बंद करके मौन के

सफ़र पर सौ बार तुम्हें पुकार रही हूँ 


तेरी यादों से बिछड़ना सज़ा लगता है

तेरे ही ख़यालो का कारवां दिनभर चले


आँखें हो चुकी अंगीठी दिल है चिंगारी

जलना तेरी तिश्नगी में अच्छा लगता है


आओ ना सही रोज़ गुज़रो ख़यालों में 

कब तक तने रहोगे तुम पर्वत की तरह


मन में उठते हो बार-बार सवाल से तुम

कहाँ सुकून ढूँढूं सवाल के जवाब तुम


अश्क बिखर जाते है बेवजह नैनों से

जब तसव्वुर में आकर  मुस्कुराते हो


तेरी यादों ने तो बखूबी रिश्ता निभाया 

तुम छोड़ गए जैसे छोड़ जाती खुशियाँ 


मेरे अल्फाज़ को ना पहचानने वाले

मेरी मौन आहों से उठते है दर्द के शोले 


कभी सदाएं सुनाई दे तो चले आना

एक ज़िंदा लाश की धड़कन को सुनने।


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