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मेरी माँ

मेरी माँ

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नटनी सी, पतली रस्सी पर

चलती रहती मेरी माँ ॥


उसको ध्यान रहा करता है

छोटी छोटी बातों का,

उसमे बसता है सोंधापन

सारे रिश्ते नातों का ।


बुआ, बहन, भौजाई सब में-

ढलती रहती मेरी माँ ॥


मिसरी बनकर वही घुली है

खारी सी तकरारों में,

भरती अपनेपन की मिट्टी

उभरी हुई दरारों में ।


घर भर के घावों पर मरहम

मलती रहती मेरी माँ ॥


आँचल के बरगद के नीचे

तपती धूप नहीं आती,

सारे जगभर की शीतलता

माँ की गोदी की थाती ।


झीने से आँचल से पंखा

झलती रहती मेरी माँ ॥


आशय बदल रहे है अपने

सचमुच नेकी और बदी,

सच्ची बातें झुठलाती है

ऐसी अंधी हुई सदी ।


जग के झूठेपन में सच्ची

लगती रहती मेरी माँ ॥


सुनती है माँ, नई हवा के

चाल-चलन कुछ ठीक नहीं,

जिस पर बढ़ते पाँव समय के

कोई अच्छी लीक नहीं ।


सोता है संसार रात भर-

जगती रहती मेरी माँ ॥


बसती है मेरी माँ, मेरी -

अपनी हँसी-ठिठोली में,

चौखट के वंदनवारों में

आँगन की रंगोली में ।


आँगन के दीये सी टिम टिम

जलती रहती मेरी माँ ॥



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