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Indu Mishra

Romance

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Indu Mishra

Romance

मेरी बेचैनियाँ बढ़ाता है

मेरी बेचैनियाँ बढ़ाता है

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मेरी बेचैनियाँ बढ़ाता है              

मेरे ख़्वाबों में जब वो आता है।         


 कैसे आँखों में उसके पढ़ लूँ मैं,       

मुझसे वो आँख कब मिलाता है।


उसकी आदत ही बन गयी है ये

मुझको हर बात पर रुलाता है।

 

बात दिल की करें भला कैसे

वो न सुनता न ही सुनाता है।  


पैरवी क्यूँ मैं उसकी करती हूँ     

मुझसे हर बात जो छुपाता है।


उलझनें मेरी अब बढ़ाकर वो         

मन ही मन ख़ुद तो मुस्कराता है।

 

देख बेचैन मुझको रातों में

चाँद आँगन से झाँक जाता है।


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