मेरा आईना और मैं
मेरा आईना और मैं
मेरा आईना और मैं
झगड़ते हैं हर दिन
वैसे तो मन कहता है
कि अब इससे उलझना
है बेकार..मगर यह भी
सोचती हूँ कभी कभी
कि क्या पता , हो जाए
वह किस पल, भूल से
मुझ पर मेहरबान ?
हिम्मत कर के पूछ ही लिया
इक दिन मैंने
अपने आईने की
आँखों में आँखें डाल
क्यों मुझसे नाराज़ है तू ?
तेरा मेरा झगड़ा कैसा ?
तू तो है बेजान, निर्लिप्त
कठोर, संवेदनहीन-
फ़र्क नहीं पड़ता तुझे
कि मेरे मासूम दिल पर
गुज़र रही है क्या
बचपन से देखा है मैंने तुझे-
तेरे सामने आते ही
होता था अहसास
कितनी बार, कितनी बार
एक अनजाने से डर का-
कि आज क्या गुल खिलाएगा
यह आईना मेरा...
है तेरी फ़ितरत नहीं
दु:ख दर्द का साथी बन
आंसू पोंछ,गले लगाने की
झूठ न बोलेगा सांत्वना देने मुझे..
आँखों में तेरे नमी नहीं मेरे लिए
परिहास या व्यंग भी नहीं-माना
तुझ में है नहीं स्पन्दन न ही चेतना
पर है कितनी तेज़ नज़र तेरी
है कितनी स्पृहणीय परख तेरी-
अद्भुत तेज,अद्वितीय चमक
जिससे छुपाने की हिमाकत
कर पाया न आज तक कोई
अपने ऐब, न कोई भाव भंगिमा--
कोशिश यह हमेशा रही नाकाम!
आज भी हूँ खड़ी तेरे सामने
उसी कशमकश में ..
सोचती हूँ तोड़ लूँ तुझसे
हर नाता कर रिश्ता
मूंद लूँ आँखें अपनी
सच्चाई से तोड़ दूँ नाता
शायद मिल जाए सुकून
आती है आवाज़ मगर बेरहम,कठोर-
आईना तोड़ने से क्या होगा
खुद से भागना है कहां मुमकिन
शरीर ने तो होना ही है जर्जर, जीर्ण
आज नहीं तो कल
झाँक ज़रा अपने अन्दर
सुन अपने अंतर्मन की आवाज़
मुस्कुरा सदा आईने के आगे भी
पहचान उस ख़ूबसूरती को
जो है अनुभवी जीवन की देन
रूह की सुन्दरता का सानी नहीं
छोड़ दे झगड़ा अब कैसा
उस आईने से...है वह तेरा दोस्त,
दुश्मन नहीं...
सीख ले सच्चाई उससे
लेले उधार उसका तेज, उसकी गरिमा
कर ले अपना जीवन सार्थक।।
