STORYMIRROR

Vaibhav Rashmi Verma

Abstract

4  

Vaibhav Rashmi Verma

Abstract

मेहँदी

मेहँदी

1 min
215

इस मेंहदी के रंग की बात निराली लगती है

सारा जीवन महका देती जब नाम पिया के लगती है

खिलती हूँ चहकती हूँ जब कुमकुम बिंदिया से सजती हूँ

दिल घबराता कुछ मुस्काता जब पीहर से चलती हूँ

मन मे दबे कुछ ख़्वाब सही उलझी उलझी सी बात कहीं

कौन कहता के घर बदला बस चेहरे ही तो बदले हैं

सास तो अपनी माँ ही है ससुर पिता बन जाता है

जब ससुराल हो पीहर जैसा जीवन संदल हो जाता है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract