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Pallavi Goel

Inspirational

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Pallavi Goel

Inspirational

मौन

मौन

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शीर्षक: मौन ​

भूमिका (कविता द्वारा):
 
मैं 'मौन' हूँ... मैं शब्दों के बीच की वह चुप्पी हूँ, जिसे तुमने अक्सर शांति समझ लिया। मैं वह दीवार हूँ, जिसे तुमने खुद अपने चारों ओर इतना ऊँचा उठा लिया कि अब तुम्हें बाहर का उजाला भी दिखाई नहीं देता। आज मैं, लेखिका की कलम से यहाँ सिर्फ कागज पर उतरने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे भीतर सोए हुए उस साहस को जगाने आई हूँ जो अब 'मिट्टी' की तरह दबते-दबते बंजर होने लगा है। ​मैं तुम्हें आईना दिखाती हूँ—ताकि तुम देख सको कि तुम्हारे हिस्से की जो नाइंसाफी है, उसमें तुम्हारी अपनी खामोशी का कितना बड़ा हाथ है। मैं तुम्हें सिसकियों और चीत्कार के बीच खड़ा करती हूँ, ताकि तुम तय कर सको कि तुम्हें बंद कमरों का घुटन भरा कोना चाहिए या खुलकर जीने का आकाश।

 पढ़िए मुझे, और देखिए कि क्या आप मुझमें छिपे उस 'झरोखे' को खोलने के लिए तैयार हैं? ​

कविता: ​
क्या तुम देख नहीं रहे, होने वाली नाइंसाफी को। क्या फर्ज़ तुम्हारा यह नहीं, पर्तें खोलो इसके लिए। ​
मौन की दीवार बहुत मोटी और ऊँची बना ली अब।
 समय का तकाज़ा यही है, एक झरोखा खोलो तुम। ​
मिट्टी भी जब दबती-दबती नीचे दबती जाती है। एक समय आता है जब नीरस बंजर बन जाती है। ​
दबा-दबा के गए जो सारे पाँव, वह अपने ही थे। दोष क्या तुम्हारा नहीं था, जो तुम दबते ही गए। ​हर किसी पर कर्ज उसका खुद का भी होता है। फिर क्यों मौन का पर्दा उसको ढकता रहता है। ​फूल खिलाना है तो उठो चीत्कार करो। नहीं तो बंद कमरे और सिसकी स्वीकार करो। ​
— पल्लवी गोयल


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