मैं सिर्फ़ रिक्त हूँ
मैं सिर्फ़ रिक्त हूँ
मैं कौन हूँ प्रश्न मन में उठता है,
नारी हूँ ,अबला हूँ कि सबला हूँ
मन के सवालों की रिक्तता कैसें भरूँ,
आखिर क्यों समाज में मै सिर्फ रिक्त हूँ।
करती हूँ अपना सर्वस्व अर्पण मैं,
खयालो का ख्वाहिश का ध्यान रख,
अपना तन मन न्योछावर करती हूँ
आखिर क्यों समाज़ मे मैं सिर्फ़ रिक्त हूँ।
सब कुछ दिया मैंने समाज को,
घर को ,'परिवार को समय देती रही,
अपनी चाहते अरमान इच्छा दबाती हूँ
आखिर क्यों समाज़ मे मैं सिर्फ़ रिक्त हूँ।
रिश्तों को सहेज कर सींचती हूँ,
मीठी वाणी से सभी का दिल जीतती हूँ,
जीने की तमन्ना दिल में मैं भी रखती हूँ ?
आखिर क्यों समाज़ मे मैं सिर्फ़ रिक्त हूँ।
कैसे करूँ अपने मन को मै परिभाषित ,
मन निष्पंद निष्क्रिय लगता है विक्षिप्त,
नदी की तरह रिश्तों मे मिल जाती हूँ,
आखिर क्यों समाज़ मे मैं सिर्फ़ रिक्त हूँ। ।
