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Ankit Tripathi

Abstract

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Ankit Tripathi

Abstract

मैं कुछ भी नहीं

मैं कुछ भी नहीं

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कुछ अपने मुझसे रूठे हैं

कुछ सपने हैं जो टूटे हैं

कुछ साथी पीछे छूट गए

जो काँच की तरह टूट गए।


इससे ज्यादा दर्द न मैं सह पाऊँगा

ये लब खामोश रहे अच्छा है

इसके आगे मैं न कुछ कह पाऊँगा।


रात अकेली है भले दहर में

चाँद का आधा कुछ भी नहीं

एक टूटा तारा आसमान पर

मैं इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।


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