STORYMIRROR

S Ram Verma

Abstract

4  

S Ram Verma

Abstract

मैं होता हूँ वहां !

मैं होता हूँ वहां !

1 min
327

कुछ भी हाँ कुछ भी कहाँ होता है वहाँ, 

जब तुम मेरे साथ नहीं होती हो वहाँ।

  

सिर्फ सन्नाटें की दीवारें होती है वहाँ,  

और बेक़रारियों की छत होती है वहाँ।

 

बेताबियों की बेतरतीब जमीं होती है वहाँ,  

हाँ हरी परत तो बिल्कुल नहीं होती है वहाँ। 

 

आसमान का नीला आंचल नहीं होता है वहाँ,  

हवाओं के बीच कंही झूल रहा होता हूँ मैं वहाँ।

 

तुम और तुम्हारी बेसुध यादें होती है वहाँ,  

तेज़-तेज़ दौड़ती हुई धड़कने होती है वहाँ।

  

मेरे काबू से बहार मेरी ही सांसें होती है वहाँ, 

और मैं एकदम तन्हा अकेला होता हूँ वहाँ। 


तन्हाई की जुबान पर मेरा नाम होता है वहाँ, 

तब भी मेरी जुबान पर तेरा नाम होता है वहाँ।


खुद-ब-खुद से अजब सी तकरार होती है वहाँ,

और टूटता बिखरता हुआ सा होता हूँ मैं वहाँ।


तारो की टिमटिमाहट भी जलती बुझती है वहाँ, 

हाँ मेरी तमाम उलझने भी हैरान होती है वहाँ।


मेरी सारी संवेदनाएं बिलकुल बेबस होती है वहाँ,

फिर भी एक तुम्हे अपने सबसे करीब पता हूँ वहाँ। 


तुम्हें अपने पास बुलाने की उम्मीद में प्रखर होता है वहाँ

तब ही तो तुम्हें तुम्हारे इंतज़ार में बैठा मिलता हूँ मैं वहां !


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract