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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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मैं और शब्द

मैं और शब्द

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एक सुहानी सुबह

किरणों का फैलता हुआ जाल

परिंदों की चहचाहट

पेड़ों की फुनगियों का

हवाओं के साथ अद्भुत नृत्य

हवाओं के तराने


जीवन मे गति, सौंदर्य

खुशहाली की चमक

प्रेम में अलिंगनबद्वत्ता

आंखों में आंखें

दिल से मिलते हुये दिल

होठों पर मुस्कराहट


इस सुंदरतम परिवेश में भी न

जब भी शब्द आते हैं

इस पार से उस पार

चले जाते हैं परिवेश के

आंखों में क्रोध उतर आता है


मुठ्ठियां भिंचने लगती हैं

दांत मिसमिसाने लगते हैं

पर शब्द खामोश रहते हैं

बस आते हैं और चले जाते हैं


मौसम में राग घोलकर

पानी मे पत्थर से उठती

हुयी हलचलों की तरह

तहस नहस कर जाते हैं

परिवेश की सुरम्यता


मन की शक्ति

और मनुष्य की आकांक्षाओं को भी

दिन प्रतिदिन यही घटा

तो एक दिन सोचा

अबकी आये न तो

किसी एक से जरूर पूछूंगा


सुकून में खलल डालने की वजह

प्रकृति से छेड़खानी का कारण

स्वभाव बदलने का मंत्र

मगर आज तक दिखे नहीं


जिनसे मैं पूछ पाता अपने सवाल

वो जब भी आये

आये और चले गये

जीवन की नियति की तरह

मैं हतप्रभ खड़ा रहा


तब तक शब्द फिर आये

और चले गये कुचलते हुये

हमारे चिंतन का संसार

छोड़ गये उदासी और अवसाद

चिंताएं और विषाद


मैं शब्दों की शक्तिहीनता

के बारे में सोच रहा था

और वो मुझे शक्तिहीन कर चले गये।


मैं फिर सोचने लगा

इस बार आये न

तो जरूर पूछूंगा उनसे

अपने पुराने सवाल

तब तक शब्द फिर

आये आये और चले गये


और इस बार तोड़ गये

मेरे देश की सीमायें

निगल गये मेरी सम्प्रभुता

और जला गये मेरे अधिकार

मैं थोड़ा चैतन्य हुआ


सोचने लगा,इस बार अगर आये न

तो जरूर उठाऊंगा अपने सवाल

शब्द फिर आने लगे

आते गये आते गये

और मैं घिरता गया शब्दों से

ऊब और ब्यग्रता में

मैंने बायां हाथ हवा में फैलाया


दो चार आये मेरी मुट्ठी में

मैंने फिर दायां हाथ फैलाया

दो चार फिर आये मेरी मुट्ठी में

एक को मैंने पैरों के नीचे दबाया

बाकी भागने लगे


मैं थोड़ा गुर्राया और चिल्लाया

हिलना नही खामोश पड़े रहना

मैं एक एक को तोडूंगा

अक्षर अक्षर बाटूंगा

मात्राएं उड़ाऊंगा


और तुममे जो स्वर है

न उनका ब्यजंन बनाऊँगा

एक एक को वस्त्रहीन करूँगा

शब्द गिड़गिड़ाने लगे

बर्फ की तरह पिघलने लगे


कहने लगे चाहो तो

अपना गुस्सा हम पर उतारो

चाहे हमे आग में जलाओ

चाहे हमे काल कोठरी में डाल दो

चाहे अंधेरे में कैद कर दो

चाहे भवसागर में डुबोओ


हम तुम्हारी ही सृष्टि हैं

तुम्हारी ही आवाज हैं

तुम्हारे ही विचार हैं

तुम्हारे ही गुलाम हैं

अंत भी हैं हम शुरुआत भी हैं

हम प्रेम भी हमी हैं दहसत भी हमी हैं

आग भी हमी हैं बर्फ भी हमी हैं

आशा भी हमी हैं निराशा भी हमी हैं


हम तुम्हारा ही स्वभाव हैं

शुरुआत चाहते हो

तो हम अंत बनेगें तुम्हारे लिये

हमे मारो मत

हममे डुबो


अपनी ही सृष्टि में डुबो

इस वार्तालाप के निस्तारण में ही

शब्द फिर आये, जाने कहाँ चले गये

बोलने लगे बोलने लगे

तुम मनुष्य हो


अपने विखरे सामान सहेजो

अपनी विखरी शक्तियां जुटाओ

मैं शब्दों में उतरता गया

डूबता

गया, डूबता गया

शब्दों ने मुझे अपना संसार बना डाला


शब्द मेरा संसार बन गये मेरा

संसार जहां सिर्फ विचार हैं

मेरा संसार जहां मुझे सब कुछ स्वीकार है

सब कुछ अंगीकार है

मेरा संसार जहां

सुबह जैसी सुबह है

और शाम जैसी शाम है।


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