मैं आज़ाद पंछी उन्मुक्त गगन की
मैं आज़ाद पंछी उन्मुक्त गगन की
कभी उड़ न पायी
क्योंकि पंख कटे थे
कभी बोल न सकी
क्योंकि जुबां पर ताला था
कभी सपने नहीं देखे
क्योंकि इस पर भी पाबन्दी थी
कब तक, कब तक
आखिर कब तक कैद रहूंगी
बंदिशों के पिंजड़े में
कब तक रखोगे पाबंदियाँ
मेरी आज़ादी की जुंबिशों पर
मैं तुम्हारी गुलाम तो नहीं
मैं तुम्हारी दासी तो नहीं
और न बंधुवा इस ज़माने की
कभी आंधी तो कभी तूफ़ान बनकर
स्वयं तोड़नी होंगी मुझे
गुलामी की ये बेड़ियाँ
दासता कि ये ज़ंजीरें
पिंजड़े से खुद को आज़ाद करना होगा
आकर देख ले ज़माने
तोड़ दी है मैंने हाथोंं की बेड़ियाँ और
उड़ चली अरमानों के नीले अम्बर में।
