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मै कबीर नहीं ...

मै कबीर नहीं ...

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दृष्टि मेरी अनुयायी है, भ्रमित होती ये रहती,

उज्जड़ जुबान सर्प की परछाई है, काँटे झरती वो कहती,

मेरी मिथ्या की डोर बड़ी ही सहज है,

जीने की चाह है बड़ी,

कष्ट मैं देता, लेता नहीं, मत भूलो मैं कबीर नहीं।


मूर्खता में ना पूजा मूर्त को, ना ही सिमरु गीत भाव नव,

अपने मज़हब की पौड़ी पर ना समझूं ज्ञान,

जीव कलरव सब वैराग्य से भय होता है,

की मृगतृष्णा अति सुंदर मुझे बुला रही,

यश वैभव का हूँ पिपासु मत भूलो मैं कबीर नहीं।


संघर्ष किया बस तन का, मन का द्वार तो था भारी सोना,

ज्ञान चक्षु बंद कर चुका सब,

नहीं याद किसी अनभिज्ञता का रोना,

सहर्ष ही करूँ धूर्तता,

जानू क्या गलत क्या सही,

वाणी में घोल दिया गरल भर, न जानू की मैं कबीर नहीं।


ना दोहे, ना चौपाये, ना ही किसी आराध्य की महिमा,

अपनी उपासना कर भरमाया मैं, रास ना आए भक्ति रस लालिमा,

पुण्य का ना मुझमे वास,

कला का भी आभास नहीं,

सीख ना दूँ अपना हो या पराया, सत्य ही सही, पर मैं कबीर नहीं ।


सहिष्णु मैं नहीं, दूसरे मज़हब की बहुत की अवहेलना,

व्यवसाय ही मेरा ईमान,

परोपकार से हुआ नहीं कभी सामना,

जीवन का रस मेरे लिए नहीं, रिक्त है प्रेम संगीत स्याही,

क्यों ना हुआ, क्यों ना हो सकूं, नहीं भूलता कभी की मैं कबीर नहीं।।




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