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Dr. Swati Rani

Abstract

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Dr. Swati Rani

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मै और वो बेवफा

मै और वो बेवफा

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बदल सी गयी हु मैं, वक्त के जख्म खाने से,              

थक सी गयी हु मंजिलों की राहों में शाम होने से !             

जैसे आती है बदबू पानी के भी रूक जानें से,            

वैसे रूक सी गयी है जिंदगी ठहराव आने से !            


मैं मैं ना रही वो वो ना रहा जाने

कौन सी बात थी उस बेवफा के होने से!                    

पहले सी ना मुस्कुराहट ना वो बेबाकपन है,            


जीना भी है मुश्किल दिल के टूट जाने से,            

कहीं खो सी गयी है शख्सियत किसी के खो जाने से,         

शायद जीना भूल गये हैं हम किसी के चले जाने से !        

मैं मैं ना रही वो वो ना रहा जाने कौन सी

बात थी उस बेवफा के होने से !                   


ढलते शाम की सी पहचान हुई है नींद चैन खोने से,          

कुछ नहीं मिलता यहाँ छुप छुप के रोने से,              

मेरे आफताब पर घने साये का एहतराम है हर कोने से,     

फर्क नहीं पड़ता किसी को यहाँ मेरे होने या जाने से ! 

              

मैं मैं ना रहीं वो वो ना रहा जाने कौन सी बात थी

उस बेवफा के होने से !


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