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सोनी गुप्ता

Abstract

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सोनी गुप्ता

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मातृत्व सुख

मातृत्व सुख

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मातृत्व का वो प्यारा सुख उस माँ को कब मिला,

जिसने नौ महीने पाला था उसे कोख में अपने,

अंतिम क्षण भी न देख पाई उस नन्ही सी जान को,

आज नन्हे शिशु को देख आँख उसकी भर आई I 


गोद में उठाया प्यार से और सब वह भूल गई,

शिशु को देखकर सारे दुःख न जाने कहाँ गए,

प्यारा सा स्पर्श उसका न जाने कितने सुख दे गया,

सब कुछ भूल कर एकटक निगाहों से देखती रही,


अनगिनत बातें कर डाली उस एक पल में ही,

वो नन्हा सा शिशु कब गोद में उसकी सो गया,

उस माँ को तो इस बात का तनिक न भान हुआ,

उसे लगा उसे जीवन की पूंजी जैसे मिल गई है,


समेट लेना चाहती थी उस पल को अपनी बांहों में,

नहीं खोना इस पल जो उसे बहुत कुछ खोकर मिला,

प्यार से उस नन्हे शिशु के सर पर हाथ लगाया,

वो अहसास जिसे वो भूलकर भी अब न भूलेगी,


तभी ये क्या हुआ वो तूफ़ान जीवन में कहाँ से आया,

उस शिशु की माँ पागलों की तरह भटक रही थी,

खोज रही थी अपने लाल को जिसको अभी था जन्म दिया,

राहत दिखी आखिर किसी की गोद में जब उसे पाया,


लपक कर ले लिया उससे अपने प्यारे से उस लाल को,

चूम लिया फिर उसके माथे और कोमल गालों को,

जैसे जाने कितने ही वर्षों से वह दूर थी अपने लाल से,

अंक में लेकर अपने लाल को सुकून की उसने सांस ली,


जिस माँ की कोख में था उसका लाल वो पत्थर सी हो गई,

आँख से अश्रु बहते मुख से बोल नहीं निकल रहे थे,

आज फिर से जैसे उसकी दुनिया उजड़ गई थी,

मातृत्व का जो भाव मन में जागा था उस नव शिशु को देख,

आज सब बिखर सा गया है दिल उसका टूट गया है I



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