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Vikas Sharma

Abstract

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Vikas Sharma

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मानव का बल

मानव का बल

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आकाश कब ये नीचे आया

हमने ही था इस पर

अपना परचम लहराया

पर्वत भी कहाँ झुका था

फिर भी मस्तक पर हमने

उसके अपने पैरों के निशां बनाया

पानी भी तो मद- मस्त हो बह रहा था                              

हमने ही उसे मनचाही राह बहाया

इतनी क्षमता , इतना बल है

उसके आगे सब कुछ निर्बल है

सतत कल्पना , अथक परिश्रम

उसी का तो ये सब फल है

अविराम चिंतन , द्रढ़ लगन

यह तो सभी समस्या का हल है

आत्म विश्वास ,अनंत धीरता

फिर तो हर कठिनाई सरल है

त्याग , सत्य ,प्रेम , करुणा

यही तो मानव का बल है


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