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Kavita Sharrma

Abstract

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Kavita Sharrma

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माँ

माँ

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जिसका पहला स्पर्श

बालक में स्पदंन भरता है 

जिसके घर में होने से

घर स्वर्ग लगता है


जिसके आगे भगवान भी

करबद्ध होता है 

वो भला करुणा की मूर्त'माँ '

के अलावा कौन हो सकता है


सबकी इच्छा -अनिच्छा का ख्याल  

जाने वह कैसे रख पाती

हर समस्या को झट

वह सुलझा देती

निराश और उदास होने पर


अपने मीठे बोल से

होठों पर हमारे

मुस्कराहट बिखेर देती 

जाने कितनी कहानियों का

खजाना तुम्हारे पास है


तुम आज नहीं हो पर मुझमें मुझे

तुम्हारे होने का एहसास है

माँ मेरा तुम्हें शत -शत प्रणाम है।


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