माँ को क्या व्यक्त करूँ
माँ को क्या व्यक्त करूँ
माँ महज़ एक लफ्ज़ नहीं,
उसमें समाहित है संसार;
हर मुश्किल में ढाल बने,
खुदमें समेटे शक्ति अपार;
हर मुश्किल में हमें संभाले,
लिए ज़हन मे दर्द हज़ार;
सीने से लगा सुरक्षा देतीं,
और देती सपनो को विस्तार;
माँ होतीं है जीवनदायनी,
माँ का प्रेम निस्वार्थ निर्विकार;
अथाह सागर है माँ का आँचल,
वात्सल्य का झलकता है अम्बार;
दर्द अपना छुपाती हमें हँसातीं,
जीवनपर्यन्त बरसता उनका प्यार;
बिना शिकायत सब करतीं जातीं,
उनमें ना कोई छल ना है अहंकार;
माँ से देवालय लगता है घर,
माँ तो प्रत्यक्ष ईश्वर का अवतार;
माँ बिना अपना वजूद कहाँ पाते हम,
ये जीवन ही उनका दिया उपहार;
माँ के त्याग और प्रेम के आगे तो,
सदियों से नतमस्तक है जग संसार;
हर साँस के ऋणी हम है उनके,
माँ ही दे सुदृढ़ जीवन का आधार;
शब्दों में क्या व्यक्त किया जाए,
माँ के बिना सब कुछ बेकार।
