मां के बराबर कोई नहीं
मां के बराबर कोई नहीं
मुझे देने को हौसलों के तोहफे ,वो आज तक रोई नहीं
परवरिश के संघर्षों को झेलती, कितनी रातें सोई नहीं,
रिश्तों की कतारों में, मेरी जननी से बड़ा हमजोली नहीं,
छिपा दें जो खामोशी के हर्फ उससे, ऐसी कोई बोली नहीं
ख्वाहिशों के आसमां पर, चांद ,तारों से लिखती वह तदबीर मेरी,
उसकी दुआओं के रसूख में, खुदा को लिखनी पड़ती है तकदीर मेरी,
शुक्र खुदा का कर सकते है ,सजदे में सर को झुकाकर
मां की रहमतों के आगे, सजदों का कोई वजूद नहीं
जिसकी कोख का कर्जदार है मेरा जीवन,
उसके आगे खुदा की बंदगी ,का भी कोई मोल नहीं।
हर शह मुकम्मल होगी उस खुदा की, इस जहां में
लेकिन मेरी मां के बराबर कोई नहीं।
