मां भारती
मां भारती
रज रज कण कण इस धरती का
चंदन जैसा पावन है।
है सौंधी सुगंध माटी की ,
और पवन मनभावन है।
है कोयल जैसा मधुर गान ,
मिश्री सी मीठी बोली ।
आगंतुक का स्वागत करती ,
द्वार पर बनी रंगोली।
संस्कृति, सदाचार यहाँ पर।
हर आंगन में पलते है।
शहर का स्वार्थ छोड़कर हम
चलो फिर गांव चलते है।
गांवों का है दृश्य अनुपम,
खेतों में है हरियाली।
नाच रही सरसों खेतों में,
झूमी गेहूँ की बाली।
सोयाबीन सत्कार कर रहा,
मक्का पास बुलाती है।
चना चबेना इठलाता है,
राई भी मुस्काती है।
पश्चिम का आडंबर तजकर,
हम परिवेश बदलते है।
शहर का स्वार्थ छोड़कर हम
चलो फिर गांव चलते है।
