STORYMIRROR

Dr Priyank Prakhar

Abstract

4  

Dr Priyank Prakhar

Abstract

लॉकडाउन: प्रलय या सृष्टि

लॉकडाउन: प्रलय या सृष्टि

1 min
141

लॉकडाउन से मिला सबक, सावधानी जरूरी पर नहीं डर,

डर कर भी जीना कोई जीना है, जीते जी हम जाते हैं मर।


एक दिन तो सबको ही मरना है, हुआ कभी ना कोई अमर,

जी लो जीवन छोड़ के डर, सावधानी में पर ना रखो कसर।


सबकी अपनी-अपनी दृष्टि, प्रलय के साथ ही चली है सृष्टि,

कुछ को पहले प्रलय दिखती, कुछ को पहले दिखती सृष्टि।


ये भी प्रलय और सृष्टि युग्म का ऐसा ही एक उदाहरण है, 

मिला समय ये आत्मचिंतन का इससे खिन्नता अकारण है।


सुन लो अब पंछी करते कलरव, बंद करो ये भय का क्रंदन,

शांत करो अब अपना मन, महसूस करो प्रकृति का स्पन्दन।


देखो धरती है कैसी मुसकाई, नभ में छाई एक नव तरुणाई,

धीरज थोड़ा तुम रख लो भाई, प्रकृति का स्वर दिया सुनाई।


तनिक झांका जब खुद के अंदर, करके निज अंतस मंथन, 

मिल गए सुप्त अभिनव गुण, कर लो अब उनका अभिनंदन।


सबक है स्पष्ट यही के अमृत पाना है तो विष भी पीना होगा,

रहो तैयार हमेशा अब तो कोरोना के संग ही जीना होगा।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract