Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer
Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer

ठाकुर छतवाणी

Children

3.9  

ठाकुर छतवाणी

Children

लकड़ी का घोड़ा

लकड़ी का घोड़ा

1 min
85


वो भी दिन थे घर चलाने पापड़ बेलती थी मेरी दादी।

पर मैं जो कुछ मांगता था वो लाकर देती थी मेरी दादी। 


एक दिन मैंने मांगा हैसियत से जादा लकड़ी का घोड़ा। 

दूसरे दिन ही मुझे उसने लाकर दिया वो लकड़ी का घोड़ा। 


 उसके बाद न जाने कितने दिन वो पापड़ बेलती रही।                        

पर मेरे साथ वो हरदम मेरी उंगली पकड़कर चलती रही।                       


वो घोड़ा दौड़ा और जिंदगी भी दौड़ी।       

दादी ने कभी मेरी उंगली नही छोड़ी।       


वो अब अलग दुनिया में रहती है

और मैं एक अलग दुनिया में रहता हूं।              


मैं अब भी उस लकड़ी के घोड़े पर

बैठकर उसे मिलने जाता हूं।  


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Children