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Damyanti Bhatt

Abstract

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Damyanti Bhatt

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क्या पाया मैंने

क्या पाया मैंने

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कुछ खो कर

ये बताना शायद 

जरूरी न हो

आज दर्पण मैं तन्हा हूं


नीर को नयन भी ठौर नहीं देते

नीर सी नयनों से गिर गयी


जो खुद को नहीं देख सके आईने मैं

उन संग रही सदा

अरे

उनके तो अंदाज निराले


हाथों की लकीरों में

क्या खोजूं उसको

जो विधि ने रचा नहीं


सिंदूर और बिंदी मैं

फर्क तो होता है


सुनो

आजाद कर दो उन परिंदों को

जिनको कैद कर बैठे हो


मेघ देखूं ,जल देखूं, दर्पण देखूं

हाथों के कंगन खनकते, संवरते, और टूट जाते


सुनानी थी अपनी कहानी

मेरा तो भाग ही जोगन सा

मेरे श्याम सुन्दर

जिसमें तुम हो कर भी नहीं हो

और जग कहता तुम्हें

हारे का सहारा


आज तोड़ दूं बंध जनमो के

और प्रेम का ग्रंथ रच दूं

कर दूं नयनों का नीर 

अंजुलि पर तेरी विसर्जन

कर लूं तेरा वरण


 मन मैं एहसास हैं 

आ जाओ प्रियतम

प्रतीक्षा तेरी

 

कुछ ने खेल खेला

कुछ ने वचन दिया

दो नावों में नाविक 

 संतुलन कैसे रखे

वो भी जब जल की दो धारायें 

पनघट पर बैठी हूं 

प्यास खुद पानी हो गयी।



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