STORYMIRROR

Ravi Jha

Abstract

3  

Ravi Jha

Abstract

कविता

कविता

1 min
216

गृहत्याग वह शब्द विहीन 

किञ्चित अंतर्व्यथा में लीन 

कदाचित अकुलाता है ऐसे जैसे 

व्याकुल हो बिन पानी के मीन।


फिर शब्दों के गहरे सागर में 

वो गोते बारंबार लगाता है 

शब्द रूपी मोती पाने पर 

वो पुलकित हर्षित हो जाता है।


चलते चलते फिर मिलने की आशा 

हर क्षण कुछ सीखने की जिज्ञासा 

कुछ शब्द नए जानने की पिपासा 

लिए भटक रहा वह प्यासा प्यासा।


कलम हाथ में और कागज़ साथ में 

भावनाओं को शब्दों में सजाता है 

विचारों को शब्दों में प्रकट कर 

वो कविता गढ़ते जाता है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract