कविता
कविता
नीला आसमां था, दोपहर की थी गरम हवा
पलक झपकते पलट गई, आस -पास की हवा
जब, नीले आसमां पे छाई काली बदरिया
तब मन का मोर मस्त होकर नाचने लगा
दिन में हुआ अंधेरा, छाई काली बदरिया
कुछ पल में बरस पड़ी, रिमझिम काली बदरिया
मौसम हुआ सुहाना, जम के बरसी बदरिया
जर्रा- जर्रा निखार गई, काली- काली बदरिया
जल थल कर गई काली बदरिया
संभल- संभल, ले छाता चलीं चंचल गोरियां
बहते बरसाती नालों में, बच्चों ने छोड़ी
कागज की छोटी बड़ी कश्तियों की टोलियां
बरस कर चली गई काली बदरिया
घोंसलों से निकल आई, पंछियों की टोलियां
शीतल पवन के झोंके से, झूम उठी डालियां
बरसों की यादें ताजा कर गई काली बदरिया।
