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Lakshman Jha

Inspirational


4  

Lakshman Jha

Inspirational


“ कविओं के स्वर्णिम युग “

“ कविओं के स्वर्णिम युग “

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पहले विषयों का

अभाव होता था ,

शब्द नहीं मिलते थे !

राग नहीं मिलते थे !

रस सारे के सारे

सूख गए थे !

ना पीड़ा थी,

ना क्रंदन था

कवि को उतना

नहीं अनुभव था !!

कलम हाथों में

रह जाती थी ,

नींदों में हम

खो जाते थे ,

स्याही भी सूख जाती थी ,

स्वप्नों में भी कोई

कल्पना नहीं जगती थी !

सूने कमरों में भी

ख्यालों की थाली

कभी नहीं बजती थी !!

बाथ रूम में भी

गुनगुनाना भूल गए ,

सीटी बजाना भी

हम भूल गए !!

पर समय इस

तरह बदल गया है ,

अब विषय ही विषय

चारों तरफ फैला गया है !!

कविओं का अब जमाना

आ गया फिर से ,

कल्पनाएं अंगड़ाईयां लेने लगी ,

कोरोना के कहरों पर कविताएं 

हजार बनने लगी !

लॉक डाउन की भयावह

तस्वीर उभर आती है !!

अनगिनत मौतें ,

बलात्कार ,राष्ट्रद्रोही

बेरोजगारी ,महंगाई ,

पलायन की बातें

लाख निकाल जातीं हैं !

किसान आंदोलन के

मसले ,नागरिकता कानून

तो छाये  हुये हैं 

पेट्रोल ,डीजल ,रसोई गैस

और खाद्य पदार्थ के मसले

स्वतः आए हुए हैं !!

विषय ,रस ,अलंकार ,

कल्पना राग सब के

सब मिलते जा रहे हैं !

अब नींद कहाँ आती है ,

अब रातों में भी

सीटी बजा रहे हैं !!

कलम आवाध

गति से चल रही है ,

नयी -नयी रोज

कविताएं बन रही है !!

बहुत दिनों के बाद

अब हम इतराएंगे ,

स्वर्णिम युग के

गीतों को फिर से दुहराएंगे !!



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