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कुमार अविनाश केसर

Abstract

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कुमार अविनाश केसर

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क्षण -मुक्त

क्षण -मुक्त

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तुम्हें-

कहाँ देखूँ!

तुम खो गए कहीं....

जब-जब देखना चाहा!


तुम्हें सुन नहीं पाता-

सुनने का स्वांग करके।

कभी यूँ ही...

सन्नाटे में....

चिहुँक उठता हूँ।


तुम,

शायद कुछ बोल जाते हो-

मन में!

तब कान नहीं सुन पाते!

आँखें बंद हो जाती हैं......

वह क्षण!!!

जब तुम दिख जाते हो।

जब तुम सुनाई पड़ते हो।


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