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SUMAN ARPAN

Abstract

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SUMAN ARPAN

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कृति या सुकृति

कृति या सुकृति

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कैसी ये रचनाकैसी ये कृति

मैं कहूँ सुकृति तू कहें विकृति

मैं कहूँ उसे पावनतू पतिता बुलाता है

मैं कहूँ उसे दुर्गा तू कोख मे मिटाता है


मै कहूँ गृह लक्ष्मी तू हिंसा पे उतर जाता हैं

मैं कहूँ अन्नपूर्णा तूअपनी भूख मिटाता है

मैं कहूँ उसे यौवन तू वासना मिटाता है

मैं कहूँ उसे गजल तू क़व्वाली गाता है


मैं कहूँ उसे सृष्टि तू संहार बन जाता हैं

मैं कहूँ उसे नदियाँ तू किनारा बन जाता है

मैं कहूँ उसे सीता तू घोबी बन जाता हैं

मैं कहूँ उसे द्रौपदी तू दुशसासन बन जाता है


मैं कहूँ उसे सती तू ज़िंदा जलाता है

मैं कहूँ उसे देवी तू महिषासुर बन आता है 

मैं कहूँ उसे मुस्कान तू अट्टहास लगाता है

मैं कहूँ उसे सहघर्मिणी बस पीछे पीछे चलाता है


मैं कहूँ अर्द्धांगिनी तो बस शैया पर अपनाता हैं 

नर और नारी श्रद्धा और मनु

दोनों सृजनहार की महान रचना है

फिर दंमभी अहंकारी नर 


नारी की क्षेष्टता को स्वीकार नहीं करता

 नारी विधाता की सबसे पावन रचना

जो सृष्टि को जन्म देती है 

वहीं संसार की पावन कृति है

संस्कृति है जिसमें न कोई विकृति है।


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