कृष्ण जन्माष्टमी
कृष्ण जन्माष्टमी
गीत :
*"कृष्ण नहीं वंशी वाले"*
कृष्ण कहीं मंदिर में बैठे देव नहीं हैं भाई,
कृष्ण वही हैं, जिसने जीवन की हँसी बचाई।
कृष्ण नहीं बस वंशी वाले मनुष्य की मुस्कान हैं,
रोते हुए समय के मुख पर खिलता हुआ विहान हैं।
जब-जब सत्ता अंधी होकर
सत्य का गला दबाती है,
जब निर्धन की रोटी छीनकर
सोने की थाली सजती है,
तब गोकुल से नहीं, हृदय से
एक श्याम निकल आता है,
जो अन्यायों के पर्वत पर
हँसते-हँसते चढ़ जाता है।
कृष्ण किसी सिंहासन की भाषा नहीं सुनाते,
कृष्ण सुदामा के आँसू में चुपके से मुस्काते।
कृष्ण न केवल राधा के हैं,
कृष्ण सभी के अपने हैं,
जिनके हिस्से धूप अधिक है,
वे भी कृष्ण के सपने हैं।
जिस किसान की पीठ झुकी है
ऋण के भारी बोझ तले,
जिस मजदूर की नींद बिकी है
शहरों के निर्माण तले,
कृष्ण वहीं हैं, जहाँ पसीना
धरती पर गीता लिखता है,
जहाँ आदमी टूट-टूटकर
फिर जीने का साहस रखता है।
आज नगर की भीड़ भरी इस
लोहे वाली दुनिया में,
कितने कंस खड़े हैं देखो
मानव की ही काया में।
झूठ बहुत ऊँचे पद पर बैठा,
सच पैदल चलता है,
लेकिन अब भी किसी गली में
कोई कान्हा पलता है।
वह बाँसुरी लेकर आएगा,
डर के बादल छाँटेगा,
मनुष्य अगर मनुष्य रहेगा,
कृष्ण यहीं फिर जन्मेगा।
कृष्ण कहीं मंदिर में बैठे देव नहीं हैं भाई,
कृष्ण वही हैं, जिसने जीवन की हँसी बचाई।
कृष्ण न पत्थर, कृष्ण न मूर्ति, कृष्ण प्रवाहित प्राण हैं,
रोते हुए समय के मुख पर खिलता हुआ विहान हैं।
*©आत्मबोध देवरिया*
