कर्म और समय का सत्य
कर्म और समय का सत्य
क्षणभंगुर जीवन की गाथा
जीवन के कटु सत्य को बतलाता
जैसे–जैसे बढ़ता जीवन
करने पड़ते कोटि यत्न
पूर्व बाल-काल उदर में बीते
शेष काल अश्रु से सींचे
स्वेद-कंप जीवन के अंग
साथ न मिलता किसी का संग
हाथ छोड़ते बढ़ते चलते
नए-पुराने हिलते-मिलते
आती प्रौढ़ावस्था जब
महत्वाकांक्षा दब जाती तब
‘स्व’ को हम चाह न पाते
‘पर’ के किसी काम न आते
जीवन हो जाता है धिक्कार
न रह पाता किसी पर अधिकार
अब आने वाली है वृद्धावस्था
न धन है, न पेंशन की व्यवस्था
जिसको सींचकर बड़ा बनाया
उसने भी अब आईना दिखलाया
जब हमने था पूर्वजों को धिक्कारा
तब उनका भी न था कोई सहारा
कर्मा फिर कर आया है
चहुं ओर घनेरी छाया है
यह जीवन सबको देता है
किए का सूद भी वापस लेता है
—अविनाश झा ‘वत्स ’
