कोरोना से कवि की बातचीत
कोरोना से कवि की बातचीत
एक सुनसान जगह,
कोरोना से भेंट हो गई .
मेरी तो सिट्टी पिट्टी ही गुम हो गई.
वह मुस्कुराया बोला,
कवि जी डर गए .
बड़े शेर बनते हो .
नेताओं पर बड़ी-बड़ी कविता लिखकर,
उन्हें डराते हो .
लोगों को मुझसे न डरने का पाठ पढ़ाते हो .
बिना मास्क लगाए ,
घर से बाहर ना आते हो .
जहां जाते हो ,
सेनेटाइजर साथ ले जाते हो.
अजवाइन लौंग कपूर की पोटली बनाकर,
हमेशा सूघते रहते हो .
हल्दी वाला दूध खूब पीते हो.
मुझसे तुम बहुत डरे डरे रहते हो .
उसके इस आरोप से,
मैं झुंझला गया.
गुस्से से भरकर बोला,
तू भी तो डरपोक है .
गर तुझ में हिम्मत है,
तो जा कर दिखा .
नेताओं की रैली में ,
बाबाओं की टोली में,
कुंभ के स्नान में,
नामांकन के जुलूस में ,
पंचायत चुनाव की वोटिंग में ,
प्रशासन से अनुमति प्राप्त शादिओं में,
यह सुनकर वह सहम गया.
बोला यार क्या बात करते हो.
तुम कवि हो ईमानदार हो ,
इसलिए किसी से नहीं डरते हो .
मैं तुम्हें राज की बात बताता हूं,
मै जब तुम्हारे यहाँ आया.
मेरे आका ने मुझे समझाया.
नेताओं और बाबाओं से सदा डरना.
धर्म और राजनीति के ,
चक्कर में ना पड़ना.
वोटिंग में ,
अपनी दखलअंदाजी मत करना.
प्रशासन के आदेश में ,
अपनी टांग न अड़ाना.
जनता पर ,
चाहे जितना कहर ढ़ाना .
तभी तुम्हें,
जीने का मिलेगा ठिकाना.
मैं उन्हीं नियमों का,
पालन कर रहा हूं.
इसलिए दिन दूनी रात चौगुनी,
तरक्की कर रहा हूं .
पुलिस से बचने के लिए ,
नाक से नीचे लटकाए,
मास्क वाले भी ,
मेरा सहयोग कर रहे हैं .
हमारे बहुत से रिश्तेदार ,
आसानी से,
उन में प्रवेश कर रहे हैं .
जनता की निडरता ,
मेरी हिम्मत बढा रही है.
बहुत सी आवादी ऐसी भी है ,
जो अभी भी मास्क नहीं लगा रही हैं .
कवि जी आप ,
चेहरे को मास्क से ढके हैं .
इसीलिये मेरे सामने निडर खड़े हैं.
मेरा आटोग्राफ लेने के लिए ,
जैसे ही उसने अपनी डायरी बढ़ाई.
मेरी आंख खुल गई ,
कोरोना से हुई बातचीत शब्दों में ढल गई.
