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Dr Arun Pratap Singh Bhadauria

Abstract

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Dr Arun Pratap Singh Bhadauria

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भूखा आदमी

भूखा आदमी

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सड़क पर अकेला चला जा रहा है, 

भूखा प्यासा, बेचारा सा दिख रहा है। 

मुश्किलों के दामन से लिपटा हुआ,

 मजबूत शहर ने उसे तोड़ दिया है।


आसपास लोग जब भी उसे देखते हैं, 

उसकी गरीबी को नजरअंदाज करते हैं। 

उनके पास समय नहीं, ध्यान नहीं है,

 कभी रुककर उसकी मदद नहीं करते है।


व्यस्त दुनिया में सबको अपना काम है,

 इस गरीब आदमी का किसको ध्यान है। 

प्यास और भूख उसके मित्र बन गए हैं, 

सड़कों पर वह रोज खुद को तृप्त करता है।


अच्छे खाने के सपने वह पालता है,

 मेहनत करके उसका भाग्य बदलता है।

 परन्तु जब तक उसके सपने पूरे नहीं होते, 

वह इस भूखे आदमी की कहानी बनते हैं।


समय बदलता है, समाज बदलता है,

 गरीबी का मुकाबला करना मुश्किल होता है।

लेकिन उम्मीद की किरण से जीवन मिलता है,

उस भूखे आदमी ने आखिर खुद को जीता है।


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