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Ram Chandar Azad

Abstract

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Ram Chandar Azad

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कोरोना का रोना

कोरोना का रोना

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अश्रुओं को चक्षुओं में कैद कर डाला है किसने ?

सबके अरमानों का गला घोंट डाला है ये किसने ?


आदमी में बीज नफ़रत के  कहाँ से उग गये हैं।

सुबह को भी शाम में तब्दील कर डाला है किसने ?


आदमी पर बदनज़र इक आदमी की देखिए तो,

आदमी को आदमी से दूर कर डाला है किसने ?


बदलते  माहौल का जिम्मेदार है नहीं कोई तो,

इस वतन में लाईलाजी का जहर डाला है किसने ?


आदमी के आज रग- रग में सियासत है बसी,

आदमी और आदमी में फर्क कर डाला है किसने ?


अब नहीं महफूज़ दिखता आदमी खुद आदमी से,

आज़ाद इस इंसानियत का कत्ल कर डाला है किसने ?


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