कोरोना का रोना
कोरोना का रोना
अश्रुओं को चक्षुओं में कैद कर डाला है किसने ?
सबके अरमानों का गला घोंट डाला है ये किसने ?
आदमी में बीज नफ़रत के कहाँ से उग गये हैं।
सुबह को भी शाम में तब्दील कर डाला है किसने ?
आदमी पर बदनज़र इक आदमी की देखिए तो,
आदमी को आदमी से दूर कर डाला है किसने ?
बदलते माहौल का जिम्मेदार है नहीं कोई तो,
इस वतन में लाईलाजी का जहर डाला है किसने ?
आदमी के आज रग- रग में सियासत है बसी,
आदमी और आदमी में फर्क कर डाला है किसने ?
अब नहीं महफूज़ दिखता आदमी खुद आदमी से,
आज़ाद इस इंसानियत का कत्ल कर डाला है किसने ?
