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Dr Baman Chandra Dixit

Abstract

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Dr Baman Chandra Dixit

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कितने कम हैं इंसां यहाँ

कितने कम हैं इंसां यहाँ

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इतने कम हो गये इंसान

के खोजने से मिलते नहीँ

आबादी बहुत बढ़ गयी मगर

वक्त पे एक भी मिलता नहीं।

बंद कमरे से लाशें निकलते

सड़े गले कई दिनों के बाद

बेटा अमेरिका बेटी मुंबई 

ख़बर कोई रखते नहीँ।

इतने कम हो गये इंसान

के खोजने से मिलते नहीँ।।


भांजा भांजी भतीजे भतीजी

कब बड़े हो गये मालूम नहीं

किसी का जनेऊ या शादी में

गया नहीं या जा सका नहीँ।

वो तो पहचान लेते मगर

हम उन्हें पहचानते नहीं

भीड़ में से अपने जैसे

चेहरे कहीँ दिखते नहीँ

इतने कम हो गए इंसान

के खोजने से मिलते नहीँ।।


छेड़खानी होती बीच बाज़ार

सुरक्षित नहीँ नारी 

नारीशक्ति वंदन अधिनियम

अद्भुत है कारीगरी

रिश्तों को तारतार करती खबरें

सुर्खियों पर अख़बार।

शैतान का तांडव प्रखर प्रचंड

अवाध आचरण हरबार।

अंधा गूंगा अपंग हुजूमों की

कहीं भी कोई कमी नहीँ

इतने कम हो गए इन्सान

के खोजने से मिलते नहीँ।।


इंसानों के दिल से इंसानियत

गुम हो गयी क्यों कैसे

अट्टहास हीन हैवानियत का

हावी हो गयी यूँ ऐसे

बेतुके तर्कों से रोज शाम

दूरदर्शन पलता है

हल्ला बोल से जनता दरबार

ताल ठोक के बोलता है।

महान महान मेहमान बोलते

आंकड़ों से एक दूजे को तोलते

वक्त निकलती सावासी मिलती

मगर हल कभी मिलते नहीं।

इतने कम हो गये इंसान

के खोजने से मिलते नहीं।।


मगर जब तक खुद के अंदर

खुद को जगा न पाओगे

ऐसे ही भीड़ के भीतर

तनहा ही रह जाओगे

कहो दिल की शुनो दिलों का

कुछ तो गम छंटेगी

हाथों से हाथ मिलाकर देखो

दूरियाँ दरमियाँ घटेगी

अब तो जागो देर हो गयी

अंधेरा छाने देंगे नहीँ।

इतने कम हो गए लोग

के खोजने से मिलते नहीँ।।

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