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Abhishek Shukla

Tragedy Inspirational

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Abhishek Shukla

Tragedy Inspirational

किसान

किसान

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'सूखी धरती की देख दरारें

भृकुटी पर बन गयी मेरी धराये।

नित नवीन चिन्ता में रहता हूं

सब सहता हूँ चुप रहता हूँ।

सलिल की एक बूँद की ख़ातिर

नित मेघों को निहारता रहता हूँ।

समझ बिछौना वसुन्धरा को

अम्बर के नीचे रहता हूँ।

रज की खुशबू धर ललाट

मैं चन्दन तिलक समझता हूँ।

धरती का सिना चीर मैं उसमे फ़सल उगाता हूँ

अपने स्वेद से सींच उसे मैं जीवन्त बनाता हूँ

यूँ ही नही मैं धरा पुत्र, किसान कहलाता हूँ।।'



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